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♥️ भगवान कल्कि और पद्मा जी की प्रेम कहानी ♥️ | kalki puran | kalki avtar kab hoya | kalyug ant 2022

😯😥 कलयुग की सच्चायी जानकर हैरान हो जाओगे 😯😥 | kalki puran | kalki avtar kab hoya | kalyug ant 2022

नमस्कार दोस्तों जय श्री कृष्णा , जय श्री राम स्वागत है एक बार फिर से आपके अपने यूट्युब चैनल रहस्य दुनिया पर । कल्कि पुराण का यह दूसरा पार्ट है । पहले पार्ट में हमने अधर्म के वंशज कल्कि राक्षस के बारे जाना था । भगवान कल्कि के जन्म के बारे में जाना था । कैसे परशुराम जी भगवान के गुरु बने थे , और कैसे भगवान शंकर ने कल्कि भगवान को अश्व, तलवार , शुक वरदान स्वरुप दिया था । इसके बाद प्रभु अपने घर पर सारा वृत्तांत सुनाकर अश्व पर सवार होकर हाथ में तलवार लेकर आगे निकल जाते हैं । आज के इस विडियो में हम भगवान कल्कि की पत्नी पद्मा कौन होंगी ? कैसे भगवान कल्कि और पद्मा का मिलन होगा ? कैसे भगवान कल्कि पद्मा जी को एक वरदान से मुक्त करेंगें । और कैसे भगवान कल्कि जी और पद्मा जी का विवाह होगा ? और भी बहुत कुछ मन को मौह लेने बाली बातें , इसलिये अराम से बैठकर इस सुन्दर प्रसंग का आनंद प्राप्त करें । दोस्तों यदि आप चाहते हैं कि मैं सनातन धर्म से जुड़े ऐसे ही विडियोस आपके लिये बनाता रहूं , तों प्लीज चैनल को सब्सक्राइब करके वेल आइकन जरुर दबा दें । और विडियो पसंद आये तो लाइक करके कोमेंट में जय श्री कल्कि भगवान जरुर लिख देना तो चलिये दोस्तों बिना टाइम को बेस्ट किये विडियो को स्टार्ट करते हैं ।
दोस्तों जब भगवान कल्कि तीक्ष्ण तलवार , धनुष और वाणों को धारण करके शिव प्रदत्त घोड़े पर सवार होकर नगरी से बहार की ओर चल देते हैं तो ,तब संत जनो से स्नेह करने वाले विशाखयूप नरेश भगवान श्री कल्कि का दर्शन करने के लिये आते हैं और सर्व प्रथम भगवान कल्कि को झुककर प्रणाम करतें और वर्तालाप करते हुये ब्रम्हण , क्षत्रिय , वेश्य तथा आश्रमादि धर्मों का संक्षिप्त विवरण देते हैं । तब भगवान कल्कि उनसे कहते हैं कि हमारे जो अंश कलि के प्रभाव से भ्रष्ट हो गये थे वह अब हमारे अवतरित होने के कारण धर्म के रास्ते पर आ गये हैं । इसलिये हे राजन तुम अश्वमेघ यज्ञ करके मेरी आराधना करो । क्योंकि में ही परलोक हुं , में ही सनातन धर्म हुं , काल , स्वभाव और संस्कार सब मेरे अनुरुप ही चलते हैं । में चन्द्रवंश और सूर्यवंश में क्रमश: देवापि और मरु नाम के राजाओं को स्थापित करुंगा और अधर्म के कुल का नाश करके पुन: धरती पर सतयुग की स्थापना करुंगा । यह सुनकर विशाखयूप नरेश ने भगवान कल्कि को प्रणाम किया और वैष्णव धर्म का वर्णन करने का अनुरोध किया इसके बाद भगवान कल्कि ने अपनी मधुर वाणी से , सभी के सामने साधु-धर्म का वर्णन किया ।
उस समय भगवान कल्कि सभा के मध्य सूर्य के समान विराजमान होकर विशाखसूप नरेश के प्रति धर्म प्रसंग कहने लगे । भगवान कल्कि वोले की कलान्तर में जब यह ब्रम्हांड नाश को प्राप्त होगा, तो यह सबकुछ मुझमें विलीन हो जायेगा । सृष्टि से पूर्व में ही विद्धभान का था और कुछ भी नहीं था , इस सम्पूर्ण जगत का कारण में ही हूं । इस सम्पूर्ण ब्रम्हांड का विनाश होने पर में सर्वशक्ति सम्पन्न विराटमूर्ति के रुप में प्रकट होता हुं , इस विराट मूर्ति के असंख्य मस्तिष्क, असंख्त नेत्र और असंख्य चरण होते हैं और इसी विराटमूर्ति से ब्रम्हा जी उत्पत्ति होती है । ब्रम्ह उपाधि बाले सर्वज्ञ पुरुष मेरी वेदवाणी के शासनुसार मेरी माया की प्रकृति , काल और अंश के सम्मिश्रण से इन जीवधारियों को प्रकट किया है । इस प्रकार मनु आदि प्रजातियों के देवता प्रकट हुये । इसके बाद इस पुराण में थोड़ा बहुत ब्रम्हाणों के बारे में लिखा गया है , जिसे हम यहां चर्चा नहीं कर रहे हैं । और भगवान कल्कि ने आगे बताया है कि वेद ही सबकुछ है वेद ही मेरे भगवान हैं । भगवान कल्कि के वचन सुनकर राजा प्रभु को प्रणाम करके वहां से चले जाते हैं । राजा के चले जाने पर भगवान शंकर द्वारा दिया गया ज्ञानी शुक यानि की तोता संध्या के समय भ्रमण से लौटकर भगवान कल्कि के समक्ष स्तुति करके खड़ा हुआ । उनके स्त्रोत पाठ को सुनकर भगवान कल्कि बोले कि तुम किधर से आ रहे हो ? तुमने वहां क्या भोजन किया ? तब शुक बोला कि हे नाथ में समुद्र के मध्य स्थित सिंघल दीप गया था । और उस दीप में घटित वृत्तांत सुनने में बढा ही अच्छा है । राजा बृहद्रथ की कन्या अमृत के समान श्रेष्ठ है । इस कन्या ने रानी कौमुदी के गर्भ से जन्म लिया है । इसका चरित्र श्रवण से पाप नाशक है , उस दीप में चारों वर्ण के लोग निवाश करते हैं । भवन , अटारी , ग्रहयुक्त नगर में वहां के राजा सुशोभित हैं । उनका भवन रत्न , स्फटिक , मणि, स्वर्ण आदि की कारीगरी से विभुषित हो रहा है । वहां स्त्रियां श्रेष्ठ वस्त्रों से सुशोभित रहती हैं एवं सरोवर में सारस , हंस आदि पक्षी किलोल कर

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