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वर्ण व्यवस्था-ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र। ऋग्वेद का पुरुषुक्त।

वर्ण व्यवस्था

वर्ण व्यवस्था प्राचीन भारतीय समाज की एक सामाजिक संरचना थी, जिसका आधार मुख्यतः व्यक्तियों के गुण, कर्म और स्वभाव पर रखा गया था। ऋग्वेद में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख मिलता है, जिसमें समाज को चार वर्गों में विभाजित किया गया था— ब्राह्मण (ज्ञान और शिक्षा के दायित्व), क्षत्रिय (शासन और सुरक्षा के दायित्व), वैश्य (व्यापार और कृषि के दायित्व) तथा शूद्र (सेवा और श्रम के दायित्व)।
इस व्यवस्था का उद्देश्य समाज में कार्य-विभाजन और संतुलन स्थापित करना था ताकि प्रत्येक वर्ग अपने कर्तव्यों का पालन करके सामाजिक जीवन को सुचारु बना सके। समय के साथ यह व्यवस्था लचीले स्वरूप से कठोर जाति-प्रथा में परिवर्तित हो गई, जिससे असमानता और भेदभाव की स्थितियाँ उत्पन्न हुईं।

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