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क्या एक वीर योद्धा के साथ ऐसा श्राप न्याय था… या यह अधर्म का सबसे उचित दंड था?

क्या एक वीर योद्धा के साथ ऐसा श्राप न्याय था… या यह अधर्म का सबसे उचित दंड था?

पिता द्रोणाचार्य के वध से क्रोधित अश्वत्थामा ने प्रतिशोध में ब्रह्मास्त्र चला दिया।
उसका निशाना था अभिमन्यु की अजन्मी संतान — पांडव वंश का अंतिम दीपक।

उस अधर्म के बाद श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को युगों-युगों तक अकेले भटकने, पीड़ा सहने और अपने कर्मों का भार ढोने का श्राप दिया।

पर सवाल आज भी वही है —
क्या यह श्राप बहुत कठोर था?
या निर्दोष गर्भ पर वार करने वाले योद्धा को यही दंड मिलना चाहिए था?

आपके अनुसार श्री कृष्ण का निर्णय न्याय था या अति? कमेंट में जरूर बताइए।

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Видео क्या एक वीर योद्धा के साथ ऐसा श्राप न्याय था… या यह अधर्म का सबसे उचित दंड था? канала भक्ति और प्रार्थना
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