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Chanakyaniti॥Chapter-5॥Shlok-16॥Sanskrit Sookti॥क्या व्यर्थ है

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वृथा वृष्टिस्समुद्रेषु
वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु
वृथा दीपोऽदिवाऽपि च॥१६॥
अन्वय- समुद्रेषु वृष्टिः वृथा, तृप्तेषु भोजनं वृथा, धनाढ्येषु दानं वृथा, दिवा अपि च दीपः वृथा॥१६॥
अर्थ- समुद्रेषु वृष्टिः वृथा=समुद्र में वर्षा व्यर्थ है।
तृप्तेषु भोजनं वृथा=तृप्त व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है।
धनाढ्येषु दानं वृथा=धनी को दान देना व्यर्थ है।
दिवा अपि च दीपः वृथा=और दिन में दीपक जलाना बेकार है॥१६॥
हमारे कर्म तभी सफल होंगे, जब हम पात्र के साथ क्रिया करेंगे। वृष्टि तभी शोभायमान होगी, तभी सफल होगी, जहाँ वृष्टि की आवश्यकता होगी। समुद्र में पहले से ही पर्याप्त जल है, इसलिए समुद्र में वर्षा करने से कोई लाभ नहीं है।
और किसी को भोजन कराना तभी फलीभूत है, जब वह भूखा हो, जो तृप्त है ऐसे व्यक्ति को भोजन कराकर कोई लाभ नहीं है। इसी प्रकार से दान तभी सफल है जब पात्र को दिया जाए जरूरतमंद को दिया जाए। जो पहले से ही धनी है ऐसे व्यक्ति को दान देकर कोई लाभ नहीं है, वहाँ दान निष्फल हो जाता है।
इस प्रकार दीपक भी अंधकार में जलाया जाता है। अंधकार में दीपक जलाना फलीभूत होता है। दीपक तभी सुशोभित होता है, जब अंधकार में जलाया जाए। दिन के उजाले में, खुले मैदान में दीपक जलाने का कोई लाभ नहीं। इसलिए कर्म वहीं करने चाहिए जहाँ लाभ हो। क्रिया तभी चरितार्थ होती है, जब उचित स्थान, उचित काल में की जाए। जो क्रिया व्यर्थ चली जाए ऐसी क्रियाओं को नहीं करना चाहिए। और क्रियाएं पात्रता जानकर ही करनी चाहिए। अपात्र के साथ की गई क्रिया कभी भी फलीभूत नहीं होती, फल नहीं मिलता।

चाणक्यनीति-दर्पण पंचम-अध्याय
ग्रन्थ-चाणक्यनीतिदर्पण
पंचम-अध्याय
लेखक-महर्षि चाणक्य
प्रस्तुति- डॉ. कुलदीप गौड़ ‘जिज्ञासु’
सम्पादन- डॉ. कुलदीप गौड़ ‘जिज्ञासु’
लेखन- डॉ. कुलदीप गौड़ ‘जिज्ञासु’
स्वर- डॉ. कुलदीप गौड़ ‘जिज्ञासु’

Видео Chanakyaniti॥Chapter-5॥Shlok-16॥Sanskrit Sookti॥क्या व्यर्थ है канала Dr. Kuldeep Gaur jigyasu
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