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1 महीने की रासलीला खत्म होने के बाद बाबा फिर से अपने नित्य नियम अनुसार तुलसी घाट पर बैठकर भगवान का ध्यान करने लगे। परंतु तब से उनके दिनचर्या में एक नई बात जुड़ गई थी। कि मुझे वृंदावन जाना है, मुझे वृंदावन जाना है।

कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा उसके बाद एक दिन प्रातः काल महाराज जी गंगा स्नान करके तुलसी घाट पर ध्यान में बैठे थे।कि तभी प्रसाद लेकर संकट मोचन मंदिर के बाबा युगल किशोर जी वहां आए और उन्होंने प्रेमानंद महाराज जी से कहा, बाबा प्रसाद ले लो।

एकांत वासी बाबा प्रेमानंद महाराज जी का किसी से कोई परिचय तो नहीं था। ऐसे किसी अपरिचित से कोई खाने की सामान लेना उचित ना समझ कर बोले की क्यों ले लूं।

तो बाबा बोले की अंदर से आपको प्रसाद देने की प्रेरणा हुई इस बात पर प्रेमानंद महाराज जी बोले, यहां और लोग भी है, मुझे ही प्रसाद देने की प्रेरणा तुम्हारी क्यों हुई। तब युगल किशोर बाबा जी ने कहा, यह संकट मोचन का प्रसाद है, मेरे अंदर आपको ही प्रसाद देने की प्रेरणा हुई इसलिए आप ले लीजिए।

फिर महाराज ने बाबा से प्रसाद लेकर खाया और अपने कमंडल से गंगाजल लेकर ग्रहण किया। उसके बाद बाबा ने महाराज को अपनी कुटिया में ले जाने के लिए आग्रह किया बहुत आग्रह करने के बाद बाबा उनके साथ गए। और युगल किशोरी जी ही उन्हें वृंदावन ले जाने के लिए तैयार हुए ऐसा सुनने के बाद महाराज काफी प्रसन्न हुए।

बनारस से सीधा वृंदावन के लिए कोई रेलगाड़ी नहीं थी इसलिए दोनों लोग चित्रकूट आ गए और दो-तीन दिन वहां रहने के बाद बाबा ने महाराज को मथुरा के लिए रेलगाड़ी पकड़ा दी।

यात्रा के दौरान उनके पास कोई पैसा नहीं था वहां पहुंचने पर भी इनके साथ कुछ घटनाएं घटी उसके बाद यह वृंदावन पहुंचकर यमुना जी में स्नान करके द्वारिकाधीश का दर्शन करने पहुंचे।

दर्शन करने के बाद महाराज को एक अद्भुत असीम सुख प्रदान हुआ। जीवन का असल मंजिल दिखाई दिया। और वे वही रोने लगे।

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